भोपाल, 26 अप्रैल(ट्रांसपोर्ट रिपोर्टर)।हाईकोर्ट के निर्देश के बाद नाके दुबारा चालू किए जाने की प्रक्रिया और ट्रक ट्रांसपोर्ट व्यवसाय की समस्याओं को लेकर आज भोपाल के ट्रक ट्रांसपोर्टरों ने एक बैठक आयोजित की। इसमें ट्रांसपोर्ट व्यवसाय को समझे बगैर लिए जाने वाले इकतरफा फैसलों को लेकर चिंता व्यक्त की गई। ट्रांसपोर्टरों ने सस्ते माल परिवहन के मार्ग में आ रहे व्यवधानों को लेकर कड़े आंदोलन करने पर भी विचार विमर्श किया।सभी ट्रांसपोर्टरों का मानना था कि जब पूरा कारोबार आनलाईन निगरानी में होने लगा है तो चेक पोस्ट लगाए जाने से कारोबार की गति प्रभावित होगी।
ट्रक ट्रांसपोर्ट ओनर वेलफेयर आर्गेनाईजेशन ने मौजूदा समस्याओं को लेकर सरकार की बेरुखी पर असंतोष जाहिर किया है। संगठन के अध्यक्ष कमल पंजवानी ने कहा कि चेकपोस्ट बंद करके सरकार ने परिवहन कारोबार को तेज गति देने का काम किया था। केन्द्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने चुंगी नाकों की बाधा हटाने का फैसला लिया था। पूरे कारोबार पर नजर रखने के लिए अस्थायी और मोबाईल चेक पोस्ट भी शुरु किए थे। शुरुआती समस्याओं के बाद ये व्यवस्था प्रचलन में आ गई थी। दुबारा बार्डर चेक पोस्ट लगाने से कारोबार में इस्पेक्टर राज शुरु हो जाएगा जो असफल व्यवस्था मानी जाती है।
संगठन के सुनील माहेश्वरी ने कहा कि इन दिनों गेहूं उपार्जन का कार्य जोरों पर है। सहकारी समितियां गेहूं खरीद रहीं हैं और माल परिवहन करके गोदामों में रखा जा रहा है। लगभग हर जिले में कलेक्टर के निर्देश हैं कि उपार्जित अनाज जल्दी से जल्दी गोदामों में रखा जाए। बदलते मौसम को देखते हुए ट्रांसपोर्टरों को कई बार ज्यादा माल भी गोदामों तक पहुंचाना पड़ता है। ऐसे में स्थानीय प्रशासन भी माल परिवहन की सीमा पर ढील देकर उपार्जन करने के निर्देश देता है। इसलिए व्यवहारिक परेशानियों को देखते हुए परिवहन को टोल नाकों की बाधाओं से बचाना अनिवार्य है।
भोपाल के प्रमुख ट्रांसपोर्टर विनोद जैन एमपीटी ने कहा कि ट्रक ट्रांसपोर्ट व्यवसाय के केन्द्रीय संगठन हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इंदौर के ट्रांसपोर्टरों ने तो हाईकोर्ट के फैसले को डबल बैंच में चुनौती देने की तैयार कर ली है। हम राजधानी भोपाल में प्रदेश के ट्रक ट्रांसपोर्ट व्यवसाय का नेतृत्व करते हैं। ऐसे में हमारा दायित्व है कि हम ट्रांसपोर्टरों की समस्याओं को शासन तक पहुंचाएं और माल परिवहन व्यवसाय को सरल बनाकर आम जनता को सस्ता परिवहन उपलब्ध कराएं।
ट्रांसपोर्टर श्री संजीव श्रीवास्तव ने कहा कि अंतर्राज्यीय माल परिवहन करने वाले ट्रक ट्रांसपोर्टर कभी ज्यादा माल भरकर नहीं चलते। वे अपनी सुरक्षा के लिए यातायात नियमों का भी पालन करते हैं। ओवरलोडिंग और ओवर स्पीड की समस्या के निराकरण के लिए ट्रांसपोर्ट विभाग का अमला हमेशा से सड़कों पर तैनात रहता है। ऐसे में दुर्घटनाएं तेज गति की वजह से नहीं बल्कि कई तकनीकी कारणों से होती हैं।चेक पोस्ट बनाए जाने के बाद भी दुर्घटनाएं टालना संभव नहीं होता है। ऐसे में सुधार की ओर बढ़ते कदमों को पीछे खींचना पूरी तरह अनुचित है। सरकार तो गुजरात मॉडल अपनाकर राज्य के विकास को तेज गति देने का प्रयास कर रही है। ऐसे में किसी काल्पनिक याचिका को स्वीकार करके चेक पोस्ट चालू करने का निर्णय लेते समय सभी पहलुओं पर विचार नहीं हो पाया है। ऐसे में डबल बैंच के सामने याचिका प्रस्तुत की जानी चाहिए ताकि हाईकोर्ट को सभी पहलुओं से अवगत कराया जा सके।
ट्रांसपोर्टरों के केन्द्रीय संगठन के प्रतिनिधि श्री हरीश डावर ने कहा कि सरकार समय समय पर निर्देश देती रहती है और ट्रांसपोर्टर उसका पालन भी करते रहते हैं। ऐसे में कारोबार के सुधारों पर तेज गति से अमल होना चाहिए। समस्याएं खड़ी करने वाले टोल नाकों को दुबारा चालू करने का फैसला उचित नही है इससे सभी ट्रक ट्रांसपोर्टर आहत हैं ।
गौरतलब है कि मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में बंद किए गए आरटीओ (RTO) चेक पोस्टों (जिन्हें चुंगी नाके या बॉर्डर चेक पोस्ट भी कहा जाता है) को दोबारा चालू करने का सख्त फैसला सुनाया है। कोर्ट ने ओवरलोडिंग और दुर्घटनाओं को रोकने के लिए इन्हें जरूरी माना है।जबलपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि वह बंद किए गए सभी बॉर्डर चेक पोस्ट को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 30 दिनों के भीतर फिर से चालू करे।जस्टिस विशाल मिश्रा की एकलपीठ ने कहा कि चेक पोस्ट का संचालन वाहनों की ओवरलोडिंग रोकने और सड़क हादसों को कम करने के लिए अनिवार्य है।
याचिका में कहा गया था कि सरकार ने पहले खुद चेक पोस्ट चालू रखने का वादा किया था, लेकिन बाद में इन्हें बंद कर दिया गया, जो कोर्ट की अवमानना (Contempt of Court) जैसा है।परिवहन विभाग ने मुख्यमंत्री के निर्देश पर 1 जुलाई 2024 से राज्य के सभी चेक पोस्ट बंद कर दिए थे।यदि 30 दिनों में चेक पोस्ट चालू नहीं होते हैं, तो याचिकाकर्ता को अवमानना की कार्रवाई फिर से शुरू करने की स्वतंत्रता दी गई है।
